लेखक: विपुल शर्मा, जयपुर
मेरा नाम विपुल शर्मा है। मैं जयपुर का रहने वाला हूँ। पेशे से मैं एक स्टूडियो आर्टिस्ट हूँ, लेकिन मेरी सबसे बड़ी पहचान यह है कि मैं खाटू श्याम बाबा का एक छोटा सा प्रेमी हूँ।
बाबा के प्रति मेरी आस्था केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि एक भावनात्मक रिश्ता है। जहाँ कहीं भी श्याम बाबा का कीर्तन होता है, वहाँ पहुँचकर मैं भावुक हो जाता हूँ। जैसे ही "हारे के सहारे" का जयकारा गूँजता है, मेरी आँखें अपने आप नम हो जाती हैं। ऐसा लगता है मानो मेरा मन सीधे अपने बाबा से जुड़ गया हो।
वैसे तो मेरे जीवन में और मेरे परिवार के साथ बाबा ने अनेक चमत्कार किए हैं, लेकिन जो घटना मैं आज आपको बताने जा रहा हूँ, वह मेरे जीवन के सबसे अद्भुत और रहस्यमयी अनुभवों में से एक है। आज भी उसे याद करता हूँ तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
30 मई 2026 को मुझे अपने परिचितों के यहाँ आयोजित श्याम संकीर्तन में शामिल होने के लिए खाटू जाना था। अगले दिन, 31 मई को प्रसादी का कार्यक्रम भी था। इसलिए मैंने परिवार सहित दो दिन खाटू में रुकने का कार्यक्रम बनाया।
हर बार की तरह इस बार भी मैं बाबा के लिए इत्र लेकर गया था। लेकिन इस बार मेरे मन में एक नया भाव आया।
मैंने सोचा—
"मैं हमेशा बाबा के दरबार से मोरछड़ी लेकर आता हूँ, लेकिन कभी बाबा को मोरछड़ी अर्पित नहीं की।"
बस फिर क्या था, मैंने एक सुंदर सी मोरछड़ी खरीदी और इत्र के साथ गाड़ी में रख ली।
खाटू पहुँचकर हम होटल गए। फिर पूरे परिवार के साथ तेरह पेडी से बाबा के दर्शन किए और थोड़ी देर विश्राम करने के बाद रात्रि 9 बजे शुरू होने वाले कीर्तन में पहुँच गए।
रात 9 बजे से लेकर सुबह 3 बजे तक श्याम नाम की ऐसी वर्षा हुई कि समय का पता ही नहीं चला। रात लगभग 3:15 बजे होटल पहुँचा तो देखा कि लाखों की संख्या में भक्त सड़कों पर बैठे हुए हैं। सभी को केवल एक ही प्रतीक्षा थी—
मंगला दर्शन खुलें और बाबा के दर्शन मिल जाएँ।
मैंने सोचा कि मुझे तो सुबह भोग लगाने जाना है, इसलिए थोड़ा आराम कर लेता हूँ।
कीर्तन करवाने वाले परिवार ने मुझसे कहा कि मैं बाबा के मंदिर में भोग लगवाऊँ।
मैंने मंदिर में बात करके सुबह 5:30 बजे का समय ले लिया। सुबह 5 बजे अलार्म बजा। मैं तैयार होकर भोग लगवाने जाने लगा।
जाने से पहले मैंने अपनी पत्नी से कहा—
"मैं अभी भोग के साथ मोरछड़ी और इत्र भी बाबा को अर्पित कर देता हूँ।"
पत्नी ने कहा—
"अभी मत ले जाओ। बाद में स्नान करके आराम से ले जाना।"
मैंने उनकी बात मान ली, लेकिन मुझे लग रहा था कि बाद में इतनी भीड़ हो जाएगी कि बाबा के निकट जाकर मोरछड़ी चढ़ाने का अवसर शायद न मिले।
भोग बहुत अच्छे से संपन्न हुआ। उसके बाद मैं होटल वापस आकर सो गया।
दोपहर तक पूरा खाटू श्याम नगरी जयकारों से गूँज रही थी।
"हारे के सहारे की जय!"
"बोलो श्याम बाबा की जय!"
हर ओर भक्तों का सैलाब था।
हम कीर्तन स्थल प्रसादी ग्रहण करने गए। वहाँ हमारे एक रिश्तेदार राहुल, जो दिल्ली से सीधे खाटू पहुँचे थे, भी हमारे साथ हो गए। उनका भी बाबा के दर्शन करने का मन था।
प्रसादी के बाद हम वापस होटल की ओर लौटे।
लेकिन मेरे मन में एक ही बात चल रही थी—
"मोरछड़ी अभी तक बाबा को नहीं चढ़ा पाया..."
दोपहर लगभग 4 बजे मैंने मन ही मन सोचा—
"अब तो भीड़ बहुत ज्यादा है। आज मोरछड़ी नहीं चढ़ पाएगी। इसे वापस घर ले चलता हूँ। अगली बार बाबा को अर्पित कर दूँगा।"
यह सोचकर मेरा मन भारी हो गया।
मैं राहुल के साथ तेरह पेडी वाली लाइन में लग गया।
मेरे हाथ में मोरछड़ी थी और इत्र की शीशी भी।
लाइन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।
कुछ दूरी पर पहुँचने के बाद अचानक मेरी नजर एक खुले हुए गेट पर पड़ी।
मैंने देखा—
गेट खुला हुआ था... और वहाँ कोई गार्ड भी नहीं था।
मैंने राहुल से कहा—
"चलो, इधर से चलते हैं।"
हम अंदर निकल गए।
थोड़ा आगे बढ़े।
एक पुल आया। कोई गार्ड नहीं।
फिर दूसरा पुल आया। वहाँ भी कोई गार्ड नहीं।
हम लगातार आगे बढ़ते गए।
और देखते ही देखते हम बाबा के दरबार के बिल्कुल निकट पहुँच गए।
जब हम सबसे आगे वाली लाइन तक पहुँचे तो मैं स्तब्ध रह गया।
वह लाइन लगभग खाली थी।
सिर्फ एक-दो गार्ड दूर खड़े दिखाई दे रहे थे।
मैं अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पा रहा था।
रविवार का दिन था। खाटू में लाखों श्रद्धालु मौजूद थे।
ऐसे दिनों में तो साँस लेना भी मुश्किल हो जाता है।
लेकिन उस क्षण ऐसा लग रहा था मानो पूरा रास्ता सिर्फ हमारे लिए खुला हो।
मैं बाबा के श्रीचरणों तक पहुँचा। कंपकंपाते हाथों से मोरछड़ी अर्पित की।
फिर इत्र की शीशी खोली और श्रद्धा से बाबा की चौखट पर इत्र लगाया।
उस क्षण मेरे मन की जो स्थिति थी, उसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं।
मेरी आँखें भर आई थीं। राहुल भी अत्यंत प्रसन्न था।
हम दोनों ने बहुत निकट से बाबा के दर्शन किए।
कुछ मिनट वहीं खड़े रहे। और फिर वापस लौटने लगे।
जैसे ही हम लौटने लगे, एक गार्ड ने मुस्कुराते हुए मुझे रोका और कहा—
"अरे... इतने से दर्शन? इतनी जल्दी जा रहे हो?"
मैंने हाथ जोड़कर कहा, "जी, दर्शन हो गए।"
और हम वापस उसी रास्ते से होटल की ओर लौट गए।
अब दृश्य बिल्कुल अलग था। हर गेट पर गार्ड मौजूद थे।
हर लाइन श्रद्धालुओं से खचाखच भरी हुई थी।
जहाँ से हम आए थे, वहाँ अब प्रवेश करना लगभग असंभव था।
मैं बार-बार पीछे मुड़कर देख रहा था।
मन में एक ही प्रश्न था—
"जब हम आए थे तब सारे गेट खुले कैसे थे?"
"गार्ड कहाँ थे?"
"सबसे भीड़ वाली लाइन खाली कैसे थी?"
आज तक मुझे इन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिला।
कुछ लोग इसे संयोग कह सकते हैं।
कुछ लोग इसे व्यवस्था की गलती कह सकते हैं।
लेकिन मैं इसे अपने श्याम की कृपा मानता हूँ।
क्योंकि मेरे मन में केवल एक ही इच्छा थी—
अपने हाथों से मोरछड़ी और इत्र बाबा को अर्पित करना।
और जब मुझे लगने लगा कि यह संभव नहीं है, तब रास्ते अपने आप खुलते चले गए।
मैं किसी को अपनी बात मनवाना नहीं चाहता। मैं केवल अपना अनुभव साझा कर रहा हूँ।
लेकिन इतना अवश्य कहूँगा—
जब भी खाटू जाओ, अपने साथ किसी ऐसे व्यक्ति को अवश्य ले जाओ जिसे श्याम बाबा की आवश्यकता हो, जो बाबा से जुड़ना चाहता हो।
और सबसे महत्वपूर्ण बात—
बाबा पर विश्वास कभी मत छोड़ना।
क्योंकि जहाँ मनुष्य की सोच समाप्त होती है, वहाँ से श्याम की कृपा शुरू होती है।
आज भी जब मैं उस दिन को याद करता हूँ, मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
ऐसा लगता है मानो बाबा मुस्कुराकर कह रहे हों—
"तू मोरछड़ी चढ़ाने आया था ना... इसलिए मैंने खुद रास्ता खुलवा दिया।"
जय श्री श्याम। 🙏💐
– विपुल शर्मा, जयपुर (एक श्याम प्रेमी का सच्चा अनुभव)